Electoral Bond : इलेक्टोरल बाॅन्ड पर क्यों लगा दी रोक और कैसे काम करता है

Electoral Bond :-

इलेक्टोरल बॉन्ड की अवधि केवल 15 दिनों की होती है जींस के दौरान इसका इस्तेमाल सिर्फ जान प्रतिनिधित्व के तहत राजनीतिक दलों को दान देने के लिए किया जा सकता है अपने एक बड़े फैसले में इलेक्टोरल बॉन्ड को अवैध और असंवैधानिक बताकर रोक लगा दी है.क्यों इलेक्टोरल बॉन्ड को लोग लगा दी वह हम देखते हैं आगे तो पहले हम देखते हैं भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने पिछले साल 2 नवंबर को इस मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. सरकार की ओर से चुनावी बॉन्ड की खरीद के लिए जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर के पहले 10 दिन तय किए गए हैं। लोकसभा चुनाव 2024 से पहले सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक बड़े फैसले इलेक्टोरल बॉन्ड को अवैध और असंवैधानिक बताकर रोक लगा दी है आगे देखते हैं कि इलेक्टोरल बॉन्ड क्या है

Electoral Bond : इलेक्टोरल बाॅन्ड पर क्यों लगा दी रोक



 इलेक्टोरल बॉन्ड क्या है :-

भारत सरकार ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की घोषणा 2017 में की थी। इस योजना को सरकार ने 29 जनवरी 2018 को कानून लागू कर दिया था। आसान भाषा में इसे अगर हम समझें तो इलेक्टोरल बॉन्ड राजनीतिक दलों को चंदा देने का एक वित्तीय जरिया है। यह एक वचन पत्र की तरह है जिसे भारत का कोई भी नागरिक या कंपनी भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से खरीद सकता है और अपनी पसंद के किसी भी राजनीतिक दल को गुमनाम तरीके से दान कर सकता है।

चुनावी बॉन्ड्स की अवधि केवल 15 दिनों की होती है, जिसके दौरान इसका इस्तेमाल सिर्फ जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत पंजीकृत राजनीतिक दलों को दान देने के लिए किया जा सकता है। केवल उन्हीं राजनीतिक दलों को इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिये चंदा दिया जा सकता है, जिन्होंने लोकसभा या विधानसभा के लिए पिछले आम चुनाव में डाले गए वोटों का कम से कम एक प्रतिशत वोट हासिल किया हो

योजना के तहत चुनावी बॉन्ड जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टूबर के महीनों में 10 दिनों की अवधि के लिए खरीद के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं। इन्हें लोकसभा चुनाव के वर्ष में केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित 30 दिनों की अतिरिक्त अवधि के दौरान भी जारी किया जा सकता है

 

चुनावी बॉन्ड कैसे काम करते हैं ?

इलेक्टोरल बॉन्ड को इस्तेमाल करना काफी आसान है। ये बॉन्ड 1,000 रुपए के मल्टीपल में पेश किए जाते हैं जैसे कि 1,000, ₹10,000, ₹100,000 और ₹1 करोड़ की रेंज में हो सकते हैं। ये आपको एसबीआई की कुछ शाखाओं पर आपको मिल जाते हैं। कोई भी डोनर जिनका KYC- COMPLIANT अकाउंट हो इस तरह के बॉन्ड को खरीद सकते हैं, और बाद में इन्हें किसी भी राजनीतिक पार्टी को डोनेट किया जा सकता है। इसके बाद रिसीवर इसे कैश में कन्वर्ट करवा सकता है। इसे कैश कराने के लिए पार्टी के वैरीफाइड अकाउंट का यूज किया जाता है। इलेक्टोरल बॉन्ड भी सिर्फ 15 दिनों के लिए वैलिड रहते हैं

क्यों है जरूरी चुनावी बॉन्ड की :-


अब आप सोच रहे होंगे कि किसी को चंदा देना है तो बिना किसी बॉन्ड के भी दिया जा सकता है उसमें बॉन्ड की जरूरत क्या है तो अभी किसी भी पार्टियों को दी जाने वाली राशि में दर्शित लाने के लिए शुरू किया गया है ताकि किसी राजनीतिक पार्टी के पास कहां से पैसे आ रहे हैं ये सभी के सामने हो. 2018 में शुरू की गई इस योजना केे प्रावधानों के मुताबिक ये बॉन्ड किसी भी व्यक्ति केे द्वारा अकेले या संयुक्त रूप से खरीदा जा सकता है. 

सुप्रीम कोर्ट नेे क्या कहा :-

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सरकार ने इस योजना से काले धन पर रोक की दलील दी थी. लेकिन इस दलील से लोगों के जानने के अधिकार पर असर नहीं पड़ता. यह योजना RTI का उल्लंघन है. कोर्ट ने कहा, सरकार ने दानदाताओं की गोपनीयता रखना जरूरी बताया. लेकिन हम इससे सहमत नहीं हैं. 

कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए आगे कहा कि चुनावी बॉन्ड योजना अनुच्छेद 19 1(a) के तहत हासिल जानने के मौलिक अधिकार का हनन करती है. हर चंदा सरकारी नीतियों को प्रभावित करने के लिए नहीं होता. राजनीतिक लगाव के चलते भी लोग चंदा देते हैं. इसको सार्वजनिक करना सही नहीं होगा. इसलिए छोटे चंदे की जानकारी सार्वजनिक करना गलत होगा. किसी व्यक्ति का राजनीतिक झुकाव निजता के अधिकार के तहत आता है. 


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